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Sunday, 12 June 2016

श्री विष्णवे नमः 

निर्जला एकादशी १६ जून को 
भगवान विष्णु को एकादशी का व्रत अतिप्रिय है ! 

ये एकादशी व्रत एक वर्ष में २४ या २६ होती हैं ! 

सभी एकादशियों मैं निर्जला  एकादशी का माहात्म्य सर्वाधिक है ! 

एकादशी व्रत माहात्म्य के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत को विधिवत करने से पुरे वर्ष भर की एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त हो जाता है ! 

सामान्यतया निर्जला एकादशी का ये पर्व गंगा दशहरा के दूसरे दिन अथवा कभी कभी गंगा दशहरा  हो जाता है किन्तु , इस वर्ष [ २०१६ में ] गंगा दशहरा १४ जून को और निर्जला एकादशी का व्रत १६ जून को ही स्मार्त -वैष्णव [गृहस्थ-सन्यासी]  आदि सभी के द्वारा मनाया जाना शास्त्रानुसार आदेशित एवं मान्य है ! क्योकि एकादशी व्रत की समाप्ति तिथि द्वादशी १७ जून को ही प्राप्त है ! 

इस निर्जला एकादशी को ही भीमसेनी एकादशी  जाता है 

Saturday, 11 June 2016


!! नमामि गंगे तव पाद पंकजम !! 


गंगा दशहरा 14 जून मंगल को 

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पुर्वान्ह व्यापिनी दशमी को पृथ्वी पर माँ गंगा का अवतरण हुआ था ! इसलिये पुर्वान्ह व्यापिनी दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है !!

 इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि १४ और १५ जून दो दिन व्याप्त  है तब  गंगा दशहरा  पर्व किस दिन मनाया जाए ??

 स्कन्द पुराण के अनुसार > ज्येष्ठ मासि सिते पक्षे दशम्याम् बुध् हस्तयो: ! व्यतीपाते गरानन्दे कन्या चन्द्रे वृषे रवौ !! 
अर्थात > ०१- ज्येष्ठ मास ०२- शुक्ल पक्ष ०३- दशमी तिथि ०४- बुधवार ०५- हस्त नक्षत्र ०६- व्यतिपात योग ०७- गर करण ०८- आनंद योग ०९- वृष राशि का सूर्य १०- कन्या राशि  चन्द्रमा !! ये  दस योग  जिस दिन भी  प्राप्त हो जाए उसी दिन गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है !! 

 किन्तु यदि ये दस  के दस योग दोनों ही दिनों मैं प्राप्त ना हो तब  ये पर्व किस दिन मनाया जाये ??
 ऐसी स्थिति में धर्म सिंधु का स्पष्ट कथन है कि >  यत्र बहूनां  योगः सा ग्राह्या ! अर्थात स्कन्द पुराणोक्त दस योगो में से अधिकाधिक योग  दोनों दिनों में से जिस दिन भी प्राप्त हो उसी दिन गंगा  दशहरा मनाना चाहिए !  

किन्तु अगर दोनों ही दिन बराबर योग प्राप्त हों तो  किस दिन मनाया जाए ?? 
तब स्कन्द पुराण का कहना है कि > दशमी तु प्रकर्तव्या सदुर्गा द्विजसत्तम !! अर्थात दोनों ही दिन बराबर योग प्राप्त हों तो गंगा दशहरा का पर्व प्रथम [ पहले ] दिन ही मनाना चाहिए !! 

इस वर्ष १४ जून २०१६  को स्कन्द पुराणोक्त दस योगो में से  ०१- ज्येष्ठ मास ०२- शुक्ल पक्ष ०३- दशमी तिथि ०४- हस्त  नक्षत्र ०५ - वृष राशि का सूर्य ०६ - कन्या राशि  चन्द्रमा !! ये संयोग प्राप्त हैं !!

 १५  जून को ०१- ज्येष्ठ मास ०२- शुक्ल पक्ष ०३- दशमी तिथि[तीन मुहूर्त से भी कम है]  ०४- बुधवार ०५- गर करण ०६- कन्या राशि का चन्द्रमा [प्रातः केवल ०६-४७ तक ही उपलब्ध है ] !!

+ ध्यान दें कि ब्रह्म  पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र का संयोग दस पापों को हरने वाला बताया है >> 
ज्येष्ठ मासि सिते पक्षे दशमी हस्तसंयुता !हरते दश पापानि तस्माद दशहरा स्मृता !! [ ब्रह्म पुराण ]
 +भविष्य पुराण के अनुसार तो ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र मंगलवार का संयोग सभी पापों को हरने वाला बताया है >>
ज्येष्ठ शुक्ल दशम्यां तु भवेद भोम दिनम यदि ! ज्ञेया हस्तर्क्ष संयुक्ता सर्व पापहरा तिथि !![भविष्य पुराण ]  :
>> स्पष्ट है कि ये हस्त नक्षत्र तथा मंगल वार दशमी तिथि के साथ  केवल १४ जून को ही प्राप्त है!!

>> स्कन्द, ब्रह्म, भविष्य पुराणादि के वचनानुसार १४ जून २०१६ को ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि के साथ हस्त नक्षत्र , मंगलवार , कन्या राशि के चन्द्र , वृष राशि  सूर्य का संयोग गंगा दशहरा पर्व को अति पुण्यदायी बना रहा है !! 
>>इस दिन श्री गंगा का स्नान, पूजन, अन्न, वस्त्र आदि का दान, पितृ तर्पण, उपवास आदि  किया जाए तो सभी प्रकार के पाप किंवा  दस प्रकार के पाप [ तीन प्रकार के कायिक, चार प्रकार के वाचिक और तीन प्रकार के मानसिक पाप] दूर होते है 

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सनातन राष्ट्र धर्म संस्कृति की सेवा में समर्पित ---------
<< श्रीमद्भागवत एवं श्रीराम कथा प्रवक्ता >>
****** आचार्यगुरु ललितानंद 'व्यास '********
वेद , कर्मकांड , ज्योतिष ,व्याकरणाचार्य [नरवर,नरोरा ] 
तंत्र , मन्त्र , यंत्र , [ श्री काशी ],
रत्न , रुद्राक्ष , ज्योतिष , वास्तु [ जयपुर ] ,
संपादक - श्री वैदिक पञ्चाङ्गम [गृहस्थ जंत्री ] , श्री गुरु जी काल निर्णय ,
पूर्व प्रधान संपादक -श्री वागनाथ पञ्चाङ्गम ,
पूर्व प्रधानाचार्य - श्री विश्वनाथ ज्योतिष-वेद विद्यालय [हरिद्वार ]
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ज्योतिष [ जन्म पत्र निर्माण - फलादेश ], तंत्र - मन्त्र - यंत्र , वास्तु , [ गृह निर्माण एवं दोष निवारण ] , रत्न - रुद्राक्ष एवं पूजन , जप , हवन आदि कर्मकांड तथा अध्यात्म से सम्बंधित अन्य समस्याओं - शंकाओं के प्रामाणिक परामर्श एवं समाधान के लिए तथा गौशालाओं की सेवार्थ निःशुल्क श्रीमद भागवत एवं श्री राम कथा आदि ज्ञान यज्ञों के सफल आयोजन के लिए निःसंकोच संपर्क करें ।      

Friday, 6 May 2016

शनि ग्रह द्वारा दिए जाने वाले कष्ट , विघ्न आदि की शान्ति के लिए शनिवार के दिन पीपल के नीचे बैठ कर
एवम अन्य दिन घर में  नित्य प्रति पूजा के समय पाठ करें ! ऐसा करने से साढ़ेसाती और ढैया की दुख़द पीड़ा
 नहीं होती !! 

 पिप्पलाद उवाच ----- 

[ श्री ] नमस्ते कोण संस्थाय पिंगलाय नमोस्तुते ! 

नमस्ते बभ्रुरूपाय कृष्णाय च नमोस्तुते !! 01 !!

नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चान्तकाय च ! 

नमस्ते यम संज्ञाय नमस्ते सौरये विभो !! 02 !! 

नमस्ते मंद संज्ञाय शनैश्चर नमोस्तुते ! 

प्रसादं कुरु देवेश दीनस्य प्रणतस्य च !! 03 !!


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 ज्योतिष [ जन्म पत्र निर्माण - फलादेश ]तंत्र - मन्त्र - यंत्र वास्तु , [ गृह निर्माण एवं दोष निवारण ] रत्न - रुद्राक्ष एवं पूजन जप हवन आदि कर्मकांड तथा अध्यात्म से सम्बंधित अन्य समस्याओं - शंकाओं के प्रामाणिक परामर्श एवं समाधान के लिए तथा गौशालाओं की सेवार्थ निःशुल्क श्रीमद भागवत एवं श्री राम कथा आदि ज्ञान यज्ञों के सफल आयोजन के लिए निःसंकोच संपर्क करें । 


Tuesday, 3 May 2016



" हिन्दू " शब्द की प्राचीनता 

हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम् ! 
तम् देव निर्मितम् देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते !! [ बार्हस्पत्य शास्त्र ] 
अर्थात >>  हिमालय के "हि" और इन्दू  सरोवर [ कन्याकुमारी ] के "न्दू" [ हिन्दू ] शब्दोपलक्षित देश का नाम हिन्दुस्थान है !! 

हिनस्ति तपसा पापान दैहिकान  दुष्ट मानसान  !
हेतिभिः शत्रु वर्गांश्च स हिंदुरभिधीयते !! [ पारिजात हरण नाटक ]
अर्थात >> जो अपने दैहिक - मानसिक पापों का तपश्चर्या के द्वारा विनाश करे और शस्त्रास्त्र से शत्रु समूह का सर्वनाश करे वह हिन्दू कहा जाता है !!

हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्परः ! 
वेद गौ प्रतिमा सेवी स हिन्दू मुख वर्ण भाक् !! [ वृद्ध स्मृति ]
अर्थात >> जो पापयुक्त हिंसा से दूर रहे , सदाचरण में तत्पर रहे अर्थात ब्राह्मण आदि वर्ण अधिकार के अनुसार अपने अपने आचरणों और कर्मों में श्रेष्ठ हों , वेद - गौ - प्रतिमाओं की  सेवा करने वाला ही हिन्दू नाम का अधिकारी है !!

हिंदु धर्म प्रलुप्तारो जायन्ते चक्रवर्तिन: ! [मेरु तंत्र प्रकाश ]  
अर्थात > कलियुग में   हिंदु धर्म  का लोप करने वाले चक्रवर्ती हो जायेंगे , और  !!

अवनी यवनै: क्रांता हिंदवो विंध्य माविशन ! [ कालिका पुराण ]
अर्थात >> पृथ्वी जब यवन , म्लेच्छ प्रायः लोगों से भर जाएगी हिन्दू [ अपनी संस्कृति  बचाने के लिए ] विंध्याचल में [ स्थित दुर्गा की शरण में ] जायेंगे !!

एक बात अवश्य ध्यान रखें >>> सनातन हिन्दू धर्म पृथ्वी से कभी समाप्त नहीं होगा क्योकि ----------

योसावास्ते योग सिद्धः कलापग्रामम् आश्रितः !
कले: अन्ते सूर्यवंशम नष्टम् भावयिता पुनः !! 

देवापि: योगमास्थाय कलापग्रामम् आश्रितः !
सोमवंशे कलौ नष्टे कृतादौ स्थापयिष्यति !! [ श्रीमद भागवत ]


सूर्यवंशी राजा मरू तथा चंद्रवंशी राजा देवापि इस समय भी कलाप ग्राम में योग साधना कर रहे हैं कलियुग में जब सूर्यवंश तथा चन्द्रवंश हो जाएगा तब सतयुग  प्रारम्भ में सूर्यवंशी राजा मरू सूर्यवंश की और चंद्रवंशी राजा देवापि चन्द्रवंश की स्थापना करेंगे !! 
हर हर महादेव 

सनातन राष्ट्र धर्म संस्कृति की सेवा में समर्पित --------- 

                     
                  <<== श्रीमद्भागवत एवं श्रीराम कथा प्रवक्ता ==>>

                       आचार्यगुरु ललितानंद 'व्यास '



             वेद , कर्मकांड , ज्योतिष ,व्याकरणाचार्य [नरवर,नरोरा ] तंत्र , मन्त्र , यंत्र ,  [ श्री काशी ],
                           रत्न , रुद्राक्ष , ज्योतिष , वास्तु [ जयपुर ] ,
                 संपादक - श्री वैदिक पञ्चाङ्गम [गृहस्थ जंत्री ] , श्री गुरु जी काल निर्णय ,
                           पूर्व प्रधान संपादक -श्री वागनाथ पञ्चाङ्गम ,
                    पूर्व प्रधानाचार्य - श्री विश्वनाथ ज्योतिष-वेद विद्यालय [हरिद्वार ]
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Monday, 25 April 2016


सनातन राष्ट्र धर्म संस्कृति की रक्षा सेवा के लिए शास्त्र और शस्त्र के संयुक्त प्रयोग के उपदेशक 

भगवान श्री परशुराम जी की जयन्ती [ 08 मई 2016 रविवार ] के उपलक्ष्य में सूक्ष्म चर्चा >>>>>>> 


?????? क्या करे ब्राह्मण जब धर्म पर संकट आये ??????  

 मनु स्मृति में ब्राह्मण के छह कर्म बताये गए हैं --  

अध्यापनमध्ययनम्  यजनम् याजनम् तथा ! 
दानम् प्रतिग्रहम् चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् !! 

अर्थात -- पढ़ना , पढ़ाना , यज्ञ करना , यज्ञ कराना , दान देना , दान लेना ये छह कर्म ब्राह्मणो के हैं !! 

किन्तु इसके साथ ये भी अवश्य ध्यान रखें कि ब्राह्मण

 केवल शास्त्र के अध्ययन अध्यापन 

 [ पढ़ने , पढ़ाने , यज्ञ करने , यज्ञ कराने , दान देने और  दान लेने आदि] 

 तक ही सीमित् ना रहे  -- 

 सनातन राष्ट्र धर्म संस्कृति की रक्षा सेवा के लिए शस्त्र प्रयोग की आज्ञा भी दी गयी है मनु स्मृति  में !!

 स्त्रम् द्विजाति भिर्ग्राह्यम् धर्मो यत्रोरुध्यते 
द्विजातीनाम् च वरणानाम् विप्लवे काल कारिते !! [ मनु स्मृति ]

अर्थात -- जब द्विजातियो को अपने धर्म पालन से रोका जाए 
अथवा समय के प्रभाव से वर्ण विप्लव [ वर्णाश्रम व्यवस्था नष्ट ] होने लगे , 
उस समय द्विजो [ क्षत्रिय, वैश्य के साथ साथ ब्राह्मण ]   को भी शस्त्र ग्रहण करना चाहिये !!!

>>>>  अर्थात धर्म की रक्षा  के लिये की गयी हिंसा धर्म ही है !! 

>>> ध्यान दें -- द्विज का अर्थ ब्राह्मण क्षत्रिय  वैश्य है !! 

Thursday, 21 April 2016

संसार के छः सुख 

अर्थागमो नित्यमरोगिता च  प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
वश्यश्च पुत्रोर्थकरी च विद्या षड जीव लोकस्य सुखानि राजन।।

>> अर्थात ---  इस नश्वर संसार में ये छः  सुख  बताए गए हैं ------

01> नित्य प्रति [ रोज ] धन की प्राप्ति होते रहना !
02 > स्वास्थ
03 > मधुर वचन बोलने वाली  और
04 > अपने [अर्थात पति के ] अनुकूल  आचरण करने वाली पत्नी
05 > आज्ञाकारी पुत्र और 
06 > ऐसी विद्या जिससे धन की प्राप्ति हो [अर्थात -अध्ययन की हुई  विद्या  से धन की  प्राप्ति होना] !! 

Monday, 18 April 2016

व्रत पर्व प्रधान सनातन धर्म में स्वयं सिद्ध मुहूर्तों की श्रृंखला में अक्षय तृतीया का अपना पृथक महत्वपूर्ण स्थान है ! अक्षय तृतीया का पर्व वसंत और ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल का महोत्सव है ! वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की मध्यान्ह व्यापिनी [ दोपहर के समय रहने वाली ]  तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है !! अक्षय तृतीया मैं तृतीय तिथि , सोमवार और कृत्तिका या रोहिणी नक्षत्र का संयोग अच्छा माना जाता है ! इसी तिथि में नर-नारायण और हयग्रीव अवतार हुए थे ! ध्यान दें -- परशुराम जी का अवतार भी इसी तिथि में  हुआ था किन्तु परशुराम जी प्रदोष व्यापिनी [ सूर्यास्त के बाद रात्रि के प्रथम प्रहार मैं रहने वाली ] तृतीया को हुआ था !अक्षय तृतीय अति पवित्र  फल देने वाली  है !!   इस दिन किये हुए  स्नान, दान, होम जप आदि सभी कर्मों का फल अनन्त होता है - सभी अक्षय हो जाते हैं ! यत्किंचिद् दीयते दानं स्वल्पम् वा यदि वा बहु ! तत सर्वम् अक्षयम् यस्मात् तनयम अक्षया स्मृता !![भविष्ये ]  अन्यत्र भी  कहा गया है -   स्नात्वा हुत्वा च दत्वा च जप्त्वानन्तफलं लभेत !!इसीलिए इस तिथि का नाम अक्षया है ! चारो युगों मैं त्रेता युग का आरम्भ भी इसी अक्षय तृतीया  से हुआ  था ! इसी से अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहते है ! इसी तिथि को चारो धामों मैं से एक धाम श्री बद्रीनाथ धाम के पट भी खोले जाते हैं ! अक्षय तृतीया को ही वृंदावन मैं श्री बिहारी जी के [चरणों के दर्शन ]  होते हैं !! सनातन धर्म के अनुयायी इस पर्व मैं  के अधिष्ठाता देवताओ [नर-नारायण ,हयग्रीव और यदि इसी दिन परशुराम जी की जयन्ती भी निश्चित हो तो परशुराम जी ] का पूजन करके सत्पात्र को जल से भरे कलश , पंखे , चरण पादुकाएं, छाता, गौ , भूमि , स्वर्णपात्र आदि का दान करते हैं !! इससे अक्षय पूण्य की प्राप्ति होती है !!