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Saturday, 31 December 2016
Saturday, 24 December 2016
Wednesday, 14 December 2016
Sunday, 4 December 2016
साक्षात् भगवान के मुख से निकली
हुई श्रीमद भगवत गीता एक रहस्यमय ग्रन्थ है |
भगवान के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, उपासना, कर्म तथा ज्ञान का वर्णन जैसा गीता मैं है वैसा अन्य ग्रंथो
मैं एक साथ मिलना कठिन है |
वेद व्यास जी ने महाभारत में
कहा है -- गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्र विस्तारै: ॥
सर्व शास्त्र मयी गीता ॥
सभी शास्त्रो का मूल है वेद ,, वेद ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट
हुए हैं ,, ब्रह्मा जी भगवान के नाभि कमल से प्रकट हुए हैं।
[ देखा जाए तो ] गीता गंगा से भी बढ़कर है
गंगा स्नान करने से स्नान करने वाले को मुक्ति मिल जाती है पर वो व्यक्ति
दूसरो को मुक्ति नहीं दे सकता। दूसरी और गीता से व्यक्ति स्वयं तो
मुक्त हो ही सकता है - वो दूसरो को भी मुक्त कर सकता है।
गीता को भगवान से भी बढकर कहा जा
सकता है --- वाराह पुराण में स्वयं भगवान कहते हैं ---
गीता श्रयेहम तिष्ठामि गीता
में च उत्तमं गृहम। गीता ज्ञानमुपाश्रित्य त्रीन्लोकान पालयाम्यहम।।
गीता भगवान का श्वास है , ह्रदय है, भगवान की वांग्मयी [ शब्द मयी ] मूर्ति है , भगवान का रहस्यमय आदेश है।
श्री कृष्ण के मुख से निकली हुई
गीता जी का संकलन व्यास जी ने एक लाख श्लोक परिमाण [संख्या ]
वाले महाभारत में किया।
भीष्म पर्व के 25 वें अध्याय से गीता का प्रारम्भ
होता है. इसमे 18 अध्याय 700 श्लोक हैं।
गीता का मुख्य तात्पर्य जीव को [ मनुष्य को ] परमात्मा की
प्राप्ति कराना है | इस सम्बन्ध मैं अनेक उपाय बताये है।
परमात्मा की प्राप्ति हेतु मैं
मुख्य रूप से दो मार्ग बताए हैं -1 ज्ञान मार्ग यानि कर्म संन्यास
२-कर्म मार्ग यानि कर्तव्य का पालन करना।
जो पुरुष सभी करमो को परमात्मा में अर्पण करके ओर
आसक्तिको त्याग कर कर्म करता है वह पुरुष जल में कमल के पत्ते की भाँति पाप से
लिप्त नहीं होता। वह भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त होता है।





Saturday, 19 November 2016
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
' शिव ' शब्द नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मा का वाचक है । यह उच्चारण में भी अति सरल , शान्तिप्रद और मधुर है ।
' शिव ' शब्द की उत्पत्ति 'वश कांतौ ' धातु से हुई है । जिसका तात्पर्य यह है कि जिसको सब चाहते हैं उसका नाम शिव है ।
सब चाहते हैं अखण्ड आनन्द को , अतः शिव का अर्थ आनंद हुआ।
जहां आनन्द है , वहीं शान्ति है।
आनंद को ही मंगल या कल्याण भी कहते हैं। अतः शिव का अर्थ परं मंगल , परं कल्याण भी हुआ।
शिव को शंकर भी कहते हैं। ' शं ' आनंद को कहा जाता है। और ' कर ' से करने वाला समझा जाता है।
अर्थात जो आनन्द करता है वही शिव है।
ये सब लक्षण उस नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मा के ही हैं।
संसार में माँगने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता परंतु , भगवान शंकर तो आक , धतूरा , बिल्वपत्र , जल मात्र चढाने से ही संतुष्ट होकर याचना करने वाले को कुछ देने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं।
जरत सकल सुर बृंद विषम गरल जेहि पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु शंकर सरिस।।
> जिस भयंकर विष [ की ज्वाला ] से सारे देवता गण जल रहे थे। उस विष को जिन्होंने स्वयं पी लिया , रे मंद मन ! तू उन श्री शिवजी को क्यों नहीं भजता ? उनके समान कृपालु कौन है।। हर हर महादेव
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