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Tuesday, 3 December 2019

गीता जयंती/gita jayanti by aacharyguru lalitanand ji



श्री गीता जयंती के उपलक्ष में नगर के कृष्णा पब्लिक स्कूल में आयोजित गीता ज्ञान प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में नगर के अनेक स्कूलों के छात्र और छात्राओं ने सहभागिता की। गीता के संबंध में प्रवचन देते हुए वैदिक साधना पीठ नरौरा के आचार्यगुरु ललितानंद व्यास जी महाराज ने बताया कि गीता का मुख्य विषय धर्म और कर्म है, किसी भी कर्म को शास्त्रोक्त विधि से भगवान का स्मरण करते हुए निस्वार्थ भाव से करना ही मनुष्य के जीवन की प्रमुखता होनी चाहिए। मनुष्य को अपने कर्तव्य कर्म की ओर ही दृष्टि और प्रयास रखना चाहिए उसके फल की ओर नहीं। आचार्यगुरु जी के प्रवचन के श्रवण के आधार पर बच्चों की मेधा शक्ति का परीक्षण किया गया।इस परीक्षा के परिणाम 15 दिसंबर को घोषित किए जाएंगे उस दिन अन्य अनेक प्रकार के कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम में कार्यक्रम के संयोजक अतुल मित्तल, सहयोगी पंकज गुप्ता, सौरभ गुप्ता, झम्मन लाल जी आदि उपस्थित रहे।।

Monday, 11 November 2019

Gita saar 02 by aacharyguru lalitanand

सृष्टि के प्रारंभ में भगवान नारायण की नाभि से उत्पन्न कमल के पुष्प से प्रकट हुए ब्रह्मा जी |  ब्रह्मा जी ने  इस संसार का निर्माण किया |  इस विश्व का निर्माण करते हुए ब्रह्माजी से मरीचि ऋषि हुए, मरीचि से कश्यप ऋषि और कश्यप ऋषि से विवस्वान नाम के सूर्य हुए | उन्हीं सूर्य का जो वंश है उसी को सूर्यवंश कहा जाता है |  इसी प्रकार ब्रह्माजी  से हुए अत्रि नाम के ऋषि, अत्रि ऋषि के नेत्रों से हुए चंद्रमा, इन्हीं चंद्रमा के वंश का नाम चंद्रवंश है | सूर्यवंश में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ और चंद्रवंश में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ |
चंद्रवंश में एक राजा हुए शांतनु ! शांतनु की पहली पत्नी गंगाजी से एक पुत्र हुए, जिनका नाम था देवव्रत, जो आगे चलकर भीष्म कहलाये | शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य |  चित्रांगद युद्ध में गंधर्वों के द्वारा मारे गए | इसके बाद विचित्रवीर्य को राजा बनाया गया | विचित्रवीर्य का विवाह अंबिका और अंबालिका नाम की कन्याओं से हुआ | विचित्रवीर्य क्षय रोग से पीड़ित होकर के नि:संतान ही मृत्यु को प्राप्त हो गए |  वेदव्यास जी की कृपा से अंबिका के द्वारा जन्म से अंधे धृतराष्ट्र का और अंबालिका के द्वारा पीलिया से ग्रस्त पांडू का जन्म हुआ | अंबिका की दासी के द्वारा विदुर जी का जन्म हुआ | धृतराष्ट्र के सौ पुत्र और एक पुत्री हुई | सौ पुत्रों का नाम अलग अलग होने पर भी उनको 'कौरव' कहा जाता था |  एक पुत्री  का नाम 'दुश्शला' था, इसका विवाह जयद्रथ से हुआ था |
धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, इसलिए धृतराष्ट्र के छोटे भाई पांडु को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया | महाराज पांडु की दो पत्नियां हुई कुंती और माद्री |  पांडू की पत्नी कुंती को देवताओं की कृपा से तीन पुत्रों [युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन] की प्राप्ति हुई और माद्री  के द्वारा दो पुत्रों [नकुल, सहदेव ] का जन्म हुआ |  एक ऋषि के शाप के कारण से पांडु की मृत्यु हो गई |  जब पांडु मृत्यु को प्राप्त हो गए तो परिस्थिति वश जन्म से अंधे धृतराष्ट्र को राजा बनाया गया, क्योंकि उस समय पांडव छोटे थे | युवा होने पर पांडवों को इंद्रप्रश्थ का राज्य दे दिया | बाद में कौरवों ने पांडवों से धोखा करके उनका सारा राजपाट छीन लिया | पांडवों ने कौरवों को समझाने बुझाने का बहुत प्रयास किया, किंतु कौरवों ने राज्य देने से मना कर दिया |  भगवान श्री कृष्ण शांति दूत बनकर गए तो दुर्योधन ने कह दिया - सूच्याग्रे नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव ! अर्थात - युद्ध के बिना सूई की नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा | युद्ध की घोषणा हो गई कौरव और पांडवों की सेना ने कुरुक्षेत्र में आमने सामने खड़ी हो गई |
कौरव पांडवों के  प्रारम्भ में श्री वेदव्यास जी ने धृतराष्ट्र को कहा कि यदि आप महाभारत का युद्ध देखना चाहते हैं तो मैं आपको दिव्य नेत्र दे सकता हूं, धृतराष्ट्र ने मना कर दिया | लेकिन कहा कि मैं महाभारत के युद्ध का समाचार जानना चाहता हूं इसलिए आप संजय को दिव्य नेत्र दे दीजिए | यह यहीं बैठ करके मुझको महाभारत का सत्य समाचार देते रहेंगे | वेदव्यास जी ने संजय को दिव्य नेत्र दे दिए | युद्ध प्रारंभ हो गया | युद्ध के दसवें दिन अर्जुन ने भीष्म पितामह को अपने बाणों से छलनी कर दिया | संजय ने जाकर धृतराष्ट्र को बताया कि भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से भूमि पर गिर पड़े हैं | तब धृतराष्ट्र ने कहा कि मुझे महाभारत के युद्ध के प्रारंभ से लेकर सारा वृत्तांत सुनाओ | संजय ने धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध के प्रारंभ से जानकारी देना प्रारंभ किया यहां से श्रीमद्भगवद्गीता का प्रारंभ होता है | श्रीमद्भगवद्गीता कोई अलग ग्रंथ नहीं है, यह महाभारत में भीष्म पर्व का पच्चीसवां अध्याय है | महाभारत के भीष्म पर्व का पच्चीसवां अध्याय श्रीमद्भगवतगीता का पहला अध्याय है | 

Sunday, 10 November 2019

गीता सारं

Related imageसाक्षात भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी से निकला हुआ श्रीमद्भगवद्गीता एक परम रहस्य मय ग्रंथ है |    भगवान के गुण, स्वरूप, उपासना तथा कर्म एवं ज्ञान का वर्णन जिस प्रकार गीता शास्त्र में किया गया है वैसा अन्य ग्रंथों में एक साथ मिलना कठिन है |    वेदव्यासजी ने महाभारत में कहा है 'गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः' अर्थात गीता को सुगीता  कहना चाहिए | गीता के अध्ययन के उपरांत अन्य शास्त्रों की आवश्यकता क्या हैगीता को ही अच्छी प्रकार से सुनना,पढ़ना-पढाना, मनन-चिंतन और धारण करना चाहिए, क्योंकि गीता स्वयं भगवान के मुख से निकली है | कहा भी गया है कि 'सर्व शास्त्र मयी गीता' अर्थात गीता सभी शास्त्रों का सार है !  कैसे ? 
सभी शास्त्रों का मूल हैं वेद ! और वेद, ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट हुए हैं ! और ब्रह्मा जी, कमल पुष्प से उत्पन्न हुए हैं !  और वो कमल का पुष्प, भगवान की नाभि से निकला है | अर्थात सबका मूल आधार हैं भगवान ! उन्हीं भगवान ने गीता को स्वयं अपने मुख से कहा है |
गीता तो गंगा-गायत्री से भी बढ़कर कही जा सकती है, क्योंकि गंगा भगवान के चरणों से निकली और गायत्री वेद का मंत्र है, जो ब्रह्मा जी के मुख से निकले हैं | गीता को भगवान से भी बढ़कर कहा जा सकता है, क्योंकि वाराह पुराण में भगवान ने स्वयं कहा है 'गीता श्रयोहं ........ | 
अर्थात भगवान कह रहे हैं किगीता मेरा सबसे अच्छा घर है | गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोगों का पालन करता हूं | इसका मतलब है कि गीता भगवान का स्वास है, गीता भगवान का हृदय है,  भगवान की शब्दरूपी मूर्ति है, गीता भगवान का रहस्यों से भरा हुआ गंभीर उपदेश है | 
भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकली गीता जी का संकलन वेदव्यास जी ने एक लाख श्लोक वाले महान ग्रंथ महाभारत में किया है | भगवान श्री कृष्ण ने गीता जी का उपदेश कहीं श्लोक में किया था तो कहीं प्रवचन में किया था | वेदव्यास जी ने भगवान के प्रवचन अंश को और अर्जुन-संजय-धृतराष्ट्र के वचनों को श्लोक बद्ध  कर दिया | इस प्रकार वेदव्यास जी ने भगवान के रहस्यमय उपदेश को 18 अध्याय और 700 लोगों में आबद्ध कर दिया | गीता ज्ञान का अथाह सागर है| श्रीगीताजी का तत्व समझने में बड़े-बड़े दिग्विजयी  विद्वान, तत्व प्रवाचक, महात्माओं की वाणी भी कुंठित हो जाती है | गीता का पूर्ण रहस्य तो भगवान श्री कृष्ण ही जानते हैं | इसके बाद संकलनकर्ता व्यास जी और गीता सुनने वाले श्रोता अर्जुन का क्रम  [नंबर]  आता है | जिस प्रकार आकाश में गरुड़ भी उड़ते हैं और साधारण मच्छर भी ! इसी के अनुसार सभी को अपने-अपने भाव के अनुसार कुछ  कुछ अनुभव होता ही है | हम भी अपने गुरुजनों से प्राप्त शास्त्रों के अध्ययन से प्राप्त अनुभव को अपनी बुद्धि सामर्थ्य के अनुसार आपके समक्ष रखेंगे |
विचार करने पर प्रतीत होता है कि गीता का मुख्य तात्पर्य संसार समुद्र में पड़े हुए जीव को परमात्मा की प्राप्ति करवा देने में हैऔर इसके लिए गीता में ऐसे उपाय बताए गए हैं जिनसे मनुष्य अपने सांसारिक कर्तव्य कर्मो का भली-भांति आचरण करता हुआ भी परमात्मा को प्राप्त कर सकता है |